
नव निर्माण भारत : रेजांगला का युद्ध भारत-चीन युद्ध का एक ऐतिहासिक और अभूतपूर्व पल है। जो भारतीय सेना के अद्वितीय साहस और बलिदान का प्रतीक बना। 1962 में हुई इस लड़ाई में 13 कुमाऊं की चार्ली कंपनी के 120 अहीरों ने अपनी वीरता और बलिदान से भारतीय इतिहास में एक अमिट छाप छोड़ी। यह युद्ध सिर्फ सैन्य साहस का नहीं, बल्कि भारत माता के प्रति निष्ठा और प्रेम का भी प्रतीक बन गया, जिसमें भारतीय सैनिकों ने अपने प्राणों की आहुति दी, लेकिन मातृभूमि की रक्षा की।
रेजांगला की ऐतिहासिक महत्ता
रेजांगला, जो कि आज के लद्दाख क्षेत्र में स्थित है, एक दुर्गम पर्वतीय क्षेत्र था, जहां भारतीय सैनिकों ने कड़ी परिस्थितियों के बावजूद अद्वितीय साहस और वीरता का परिचय दिया। यहां पर, 13 कुमाऊं की चार्ली कंपनी के तहत कुल 120 अहीर सैनिकों ने चीनी सैनिकों से लोहा लिया। इन वीर अहीरों ने यह सिद्ध कर दिया कि जब मातृभूमि की रक्षा की बात आती है, तो कोई भी चुनौती बड़ी नहीं होती।
मेजर शैतान सिंह के नेतृत्व में जिनका नाम इस युद्ध में अमर हो गया इन अहीर सैनिकों ने चीनी सैनिकों से घेराबंदी के बावजूद अपनी जान की बाजी लगाई। वे जानते थे कि उनकी संख्या चीनी सैनिकों से कहीं कम थी। लेकिन उनकी निष्ठा और देशभक्ति ने उन्हें विजय प्राप्त करने की प्रेरणा दी।
रेजांगला के युद्ध में कुल 114 अहीर सैनिक शहीद हो गए, लेकिन उन्होंने मातृभूमि की रक्षा करते हुए अपनी जान की आहुति दी। वे वीरता और बलिदान के पर्याय बन गए। इस युद्ध ने यह स्पष्ट कर दिया कि भारतीय सेना का हर सैनिक, चाहे वह किसी भी जाति, धर्म, या समुदाय का हो, मातृभूमि की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति देने को तैयार है।
अहीरों का योगदान और भारतीय सेना में उनकी भूमिका
भारतीय सेना में अहीरों का योगदान अपार है। अहीर समाज के लोग हमेशा से ही भारत की रक्षा में अग्रणी रहे हैं। रेजांगला में वीरता दिखाने वाले अहीर सैनिकों ने अपनी शौर्य गाथा से यह सिद्ध किया कि वे हमेशा देश की सुरक्षा के लिए तत्पर रहते हैं। यह समाज सिर्फ एक सैन्य समाज नहीं है, बल्कि यह भारतीय संस्कृति और राष्ट्र के प्रति अडिग निष्ठा रखने वाला एक समुदाय है।
अहीर सैनिकों का सैन्य इतिहास बहुत पुराना है और वे भारतीय सेना में हमेशा एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते आए हैं। रेजांगला जैसे युद्ध में उनका योगदान भारतीय सेना के लिए अमूल्य रहा है। अहीर समाज ने हमेशा अपने बलिदान और साहस से यह साबित किया है कि वे मातृभूमि की रक्षा के लिए हर हद तक जा सकते हैं।
अहीर रेजिमेंट की स्थापना की आवश्यकता
रेजांगला की शौर्य गाथा को केवल इतिहास में संजोना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि इसके सम्मान में कुछ ठोस कदम उठाए जाने चाहिए। आज, जब हम इन वीर अहीर सैनिकों की बलिदान की याद करते हैं, तो यह समय आ गया है कि हम उनके योगदान को और भी सम्मान दें। इस संदर्भ में मेरी भारत सरकार से विनम्र अपील है कि रेजांगला के वीर अहीर सैनिकों की शौर्य गाथा को और सम्मान देने के लिए एक अहीर रेजिमेंट की स्थापना की जाए। इससे न केवल अहीर समाज का सम्मान बढ़ेगा, बल्कि पूरे देश में इस समाज की वीरता और निष्ठा को और अधिक महत्व मिलेगा।
एक अहीर रेजिमेंट का गठन, न केवल भारतीय सेना की ताकत को और बढ़ाएगा, बल्कि इससे हमारे समाज की गौरवमयी परंपरा को भी सम्मान मिलेगा। आज के समय में जब भारतीय सेना को हर चुनौती का सामना करना पड़ता है, ऐसे में अहीर रेजिमेंट का गठन भारतीय सेना की शक्ति को और भी बढ़ा सकता है।
यदुवंशी समाज और कृष्ण भगवान की प्रेरणा
अहीर समाज का एक गहरा ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंध है यदुवंशी समुदाय से। कृष्ण भगवान, जिनके नेतृत्व में महाभारत का युद्ध लड़ा गया, एक कुशल रणनीतिकार और नायक थे। उनके नेतृत्व में हर यादव और अहीर समाज के लोग अपने प्राणों की आहुति देने के लिए तैयार रहते थे। यही कारण है कि आज भी यदुवंशी समाज के लोग देश की रक्षा में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। कृष्ण भगवान ने हमेशा यह सिखाया कि सही नेतृत्व और रणनीति से कोई भी युद्ध जीता जा सकता है। आज भी भारतीय सेना में यदुवंशी और अहीर समाज के लोग अपने साहस और नेतृत्व क्षमता से दुनिया भर में नाम कमा रहे हैं। यही वह प्रेरणा है, जो हमें हमारे पूर्वजों के बलिदान और उनके मार्गदर्शन से मिलती है।
रेजांगला दिवस पर पवन यादव प्रदेश अध्यक्ष सोशल मीडिया यूपी (भारतीय जनसेवा मिशन) पंजीकृत-अंडर मिनिस्ट्री ऑफ कॉरपोरेट अफेयर्स एंड नीति आयोग, भारत सरकार द्वारा इस विषय पर लिखा गया व राकेश सिसौदिया ( युवा पत्रकार और निदेशक ) द्वारा इसको विस्तार से लिखा गया।