
बरेली, राकेश सिसौदिया। ठेकेदार अब नगर निगम के चक्कर काट-काटकर थक चुके हैं। महीने-बरसों तक फाइलें धूल फांकती हैं। भुगतान की फाइलें अफसरों की टेबल पर आराम फरमाती हैं और ठेकेदार कोर्ट-कचहरी के चक्कर काटते रहते हैं। आखिरकार परेशान ठेकेदारों ने नगर निगम से किनारा कर लिया और पीडब्ल्यूडी की दुनिया में एंट्री मार दी।
अब पीडब्ल्यूडी में 10 से ज्यादा ठेकेदार काम कर रहे हैं जो पहले नगर निगम के लिए सड़कें और इन्फ्रास्ट्रक्चर बनाते थे।ठेकेदारों का कहना है कि नगर निगम में बिना ऊपर पहुंच बनाए पैसे मिलना नामुमकिन है। यहां तक कि कोर्ट का आदेश आए बिना तो फाइलों को हिलाना भी मुश्किल होता है। जो ठेकेदार नगर निगम में काम कर चुके हैं वे अब इसे धैर्य परीक्षा केंद्र कहते हैं। ठेकेदारों के मुताबिक पहले फाइल जमा करो फिर उस पर आपत्ति लगती है।
आपत्ति का जवाब दो तो कोई नया नियम आ जाता है। और अगर सब सही निकला तो बस सही समय का इंतजार करो जो कभी आता ही नहीं। जो ठेकेदार अफसरों के खास हैं उनके भुगतान वीआईपी ट्रीटमेंट के साथ रिलीज हो जाते हैं। बाकी लोग अपने पैसे के लिए धक्के खाते रहते हैं।
नगर निगम की लेटलतीफी को देखते हुए एनकैप के कई बड़े प्रोजेक्ट अब पीडब्ल्यूडी को ट्रांसफर कर दिए गए हैं। इनमें मिनी बाईपास चौड़ीकरण, मंडी से एयरफोर्स गेट तक सड़क निर्माण, चौपुला समेत कई इलाकों में सड़कें मजबूत करने का काम काम शामिल हैं।
ठेकेदारों का मानना है कि नगर निगम में काम के बाद 5 साल तक मेंटेनेंस और एफडी भी फंसी रहती है। वहीँ पीडब्ल्यूडी में बस 2 साल का मेंटेनेंस और भुगतान में भी आसानी होता है।